

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले की तपकरा तहसील में इन दिनों एक ऐसी “ऑफ़िस ब्लॉकबस्टर” चल रही है, जिसमें न ही हीरो को सेट पर वैनिटी मिल रही है और न ही विलेन को किसी का डर—सब कुछ रियल लोकेशन पर रियल दर्द के साथ फिल्माया जा रहा है।
कहानी के हीरो हैं—हमारे कोटवार साथी।
और विलेन? वही पुरानी चालें—शोषण, बेवजह का काम और ऊपर से डांट–डपट का बोनस!
—
पहला सीन – मनोहर लाल चौहान की एंट्री
जैसे ही प्रदेश संगठन मंत्री मनोहर लाल चौहान दृश्य में प्रवेश करते हैं, माहौल बदल जाता है।
कोटवारों की परेशानियां जब उनके सामने लाई जाती हैं, तो वे तुरंत “रिव्यू मीटिंग” मोड में आ जाते हैं—ठीक वैसे, जैसे कोई फिल्म डायरेक्टर शूट से पहले सीन की बारीकियां समझता है।
—
दूसरा सीन – ज्ञापन का ‘क्लाइमेक्स मोमेंट’
बैठक के बाद मनोहर लाल चौहान और कोटवारों का दल एसडीओ (राजस्व) तपकरा के जरिए जिला कलेक्टर जशपुर तक अपनी आवाज पहुंचाते हैं।
उनकी मांगों की स्क्रिप्ट कुछ यूं है—
महीने में तीन बार नहीं, सिर्फ एक बार हाजिरी
डिपार्टमेंटल डबल रोल बंद—कोटवार न गार्ड हैं, न सफाईकर्मी
समय पर पारिश्रमिक—पहले हफ्ते में पैसा, तभी चलेगा घर का खर्चा
धान खरीदी केंद्रों में कोटवारों को भी खरीदी का हक
और सबसे ज़रूरी—प्रदेश की सीमाओं पर कोटवार नहीं, प्रशिक्षित जवान तैनात हों!
क्योंकि ये कोई एक्शन फिल्म नहीं, जहां बिना सुरक्षा के किसी को स्टंट करा दिया जाए!
—
तीसरा सीन – चेकपोस्ट का ड्रामा
कहानी का ट्विस्ट आता है—
सिंगी बहार चेकपोस्ट क्रमांक 13 पर तैनात ललित कोटवार को अचानक से बिचौलियों से साठगांठ का आरोप लगाकर बर्खास्त कर दिया जाता है।
लेकिन सीन के अंदर सीन ये है—
संदिग्ध पिकअप गाड़ी बैरिकेड तोड़कर उड़ीसा की ओर भाग जाती है, नगर सैनिक और एसडीएम उसका पीछा करते हैं…
और इसी बीच 500 रुपये ललित कोटवार की जेब से बरामद कर अनुशासनात्मक कार्यवाही का पूरा सीन शूट कर दिया जाता है!
मगर…
बाकी ड्यूटी पर तय कर्मचारियों पर कोई कार्रवाई नहीं?
कैमरा सिर्फ एक ही कलाकार पर क्यों फोकस?
यही तो कहानी में सस्पेंस है!
—
फाइनल सीन – कोटवार एसोसिएशन की गरज
मनोहर लाल चौहान, अयोध्या प्रसाद, गुरु दयाल, संतोष चौहान, प्रकाश तिग्गा, अजय टोप्पो सहित सभी कोटवार साथी एक सुर में कहते हैं—
“ललित कोटवार के साथ अन्याय हुआ है—बर्खास्तगी रद्द करो! बहाली दो!”
और साथ ही सीएम माननीय श्री विष्णु देव साय के नाम भी पूरा मांगपत्र भेजकर संदेश दिया गया—
“कोटवारों को बॉडी डबल बनाना बंद कीजिए…
सीमा सुरक्षा का सीन असली जवानों के लिए है, कोटवारों के लिए नहीं।”
यह सिर्फ शिकायत नहीं, कोटवारों की उस भावनात्मक फिल्म का हिस्सा है जिसमें रोज़ मेहनत करने वाला कलाकार बिना ट्रेलर, बिना प्रमोशन—अपना रोल निभाता रहता है।
अब जनता, प्रशासन और सरकार की बारी है कि इस फिल्म का “हैप्पी एंडिंग” लिखे।






